20 जुलाई2026 देश की राजधानी दिल्ली से सामने आई तस्वीरें बेहद भयावह और चिंताजनक हैं। सबसे पहले सोनम वांगचुक को जंतर-मंतर से जबरन हिरासत में लिया गया। इसके बाद 20 जुलाई को प्रस्तावित संसद घेराव से ठीक एक दिन पहले जंतर-मंतर की बैरिकेडिंग कर दी गई। इतना ही नहीं, वेल्डिंग के जरिए उसे एक किलेबंद क्षेत्र, बल्कि एक जेल जैसी शक्ल दे दी गई।
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ये सभी दृश्य इस बात का संकेत देते हैं कि सरकार भीतर से भय और असुरक्षा की स्थिति में दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि सत्ता संविधान और कानून की भावना के अनुरूप चलने के बजाय धीरे-धीरे अधिक केंद्रीकृत और कठोर शासन शैली की ओर बढ़ रही है।
अन्ना हज़ारे का आंदोलन भी इसी जंतर-मंतर से शुरू हुआ था और बिना लाठीचार्ज, आँसू गैस या खून की एक बूंद बहाए अपने तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचा। उसी आंदोलन के परिणामस्वरूप 28 दिसंबर 2013 को दिल्ली में कांग्रेस सरकार का अंत हुआ और फिर 2014 के आम चुनाव में केंद्र में भी कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई।
हालाँकि, यूपीए और एनडीए की शासन शैली में एक स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। मनमोहन सिंह की सरकार ने प्रदर्शनकारियों पर गोलियाँ नहीं चलाईं और न ही आंदोलन को बदनाम करने या माहौल बिगाड़ने के लिए कथित तौर पर अपने लोगों को भेजने जैसे आरोप उस पर लगे। इसके विपरीत, आज असहमति की आवाज़ को बल प्रयोग के माध्यम से दबाने का प्रभाव लगातार गहराता हुआ दिखाई देता है।

चाहे सीएए विरोधी आंदोलन हो, किसान आंदोलन हो या अब “कॉकरोच जनता पार्टी” का आंदोलन, हर अवसर पर सरकार पर यह धारणा बनी कि उसने असहमति से निपटने के लिए बल प्रयोग और कथित षड्यंत्रकारी तरीकों का सहारा लिया।
चिंता की बात यह है कि बल प्रयोग के दौरान भी संवैधानिक मर्यादाओं और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन होता हुआ दिखाई नहीं देता। कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस और अर्धसैनिक बलों के अनेक जवानों की वर्दी पर नाम-पट्टिकाएँ नहीं दिखतीं, जबकि सादे कपड़ों में लाठियाँ लिए सैकड़ों लोग भी प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग करते नज़र आते हैं। इन लोगों की पहचान और आधिकारिक स्थिति के बारे में आम जनता को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं होती कि वे पुलिस या अर्धसैनिक बलों से जुड़े हैं या किसी अन्य संस्था से।

उक्त व्यक्ति चाहे किसी भी विभाग या संस्था से जुड़े हों, मूल प्रश्न यह है कि वे अपनी पहचान, नाम और पद क्यों छिपा रहे हैं? उन्हें ऐसा करने का अधिकार किसके आदेश पर दिया गया है और संविधान या कानून की किस धारा के तहत इस प्रकार की व्यवस्था की अनुमति है? यदि वे वास्तव में सरकारी कर्मचारी हैं तो अपनी पहचान उजागर करने से परहेज़ क्यों किया जा रहा है?
सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में यह धारणा भी व्यक्त की जा रही है कि सादे कपड़ों में प्रदर्शनकारियों पर लाठियाँ बरसाने वाले लोग आरएसएस या भाजपा से जुड़े हो सकते हैं, जबकि बिना नेम प्लेट और बिना पहचान बैज वाले पुलिस एवं अर्धसैनिक कर्मियों को लेकर भी विभिन्न प्रकार के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि ये आरोप कभी सही सिद्ध होते हैं तो किसी भी लोकतांत्रिक देश के लिए यह अत्यंत चिंताजनक और शर्मनाक स्थिति होगी।
इस सार्वजनिक धारणा को पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना भी आसान नहीं है। यह तर्क भी दिया जाता है कि पेशेवर और विभागीय प्रशिक्षण प्राप्त पुलिसकर्मी संवैधानिक एवं कानूनी सीमाओं का उल्लंघन करने में हिचकिचा सकते हैं, जबकि यदि ऐसे लोगों का उपयोग किया जाए जो नियमित सरकारी कर्मचारी न हों, तो उनसे कानून और संवैधानिक दायित्वों के पालन की वही अपेक्षा नहीं की जाती।
इसी आधार पर इस दावे को पूरी तरह ख़ारिज नहीं किया जा सकता कि यदि किसी संवैधानिक और सिद्धांत आधारित आंदोलन को रोकने के लिए अज्ञात पहचान वाले या कथित रूप से गैर-जवाबदेह व्यक्तियों का सहारा लिया जाए, तो ऐसा तरीका संवैधानिक और लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन करने वाले अधिकारियों की तुलना में अधिक प्रभावी माना जा सकता है।

दिल्ली से आई ये तस्वीरें सरकार की बेबसी और बेचैनी को दर्शाती हैं। “56 इंच के सीने” वाले नरेंद्र मोदी ने धर्मेंद्र प्रधान से इस्तीफ़ा लेने के बजाय संसद से दूर रहने को प्राथमिकता दी। आखिर धर्मेंद्र प्रधान में ऐसी कौन-सी विशेषता है कि कथित तौर पर दर्जनों पेपर लीक के आरोपों और देशभर के लाखों विद्यार्थियों के भविष्य पर उठ रहे गंभीर सवालों के बावजूद उनसे इस्तीफ़ा लेना भी संभव नहीं हो पा रहा?
यदि विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़े इतने बड़े विवाद के बावजूद भी राजनीतिक जवाबदेही तय न हो सके, तो यह सरकार की प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्न अवश्य खड़े करता है।
इस्तीफ़ा लिया जाए या नहीं, यह अपने आप में एक अलग राजनीतिक विषय है। लेकिन जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों के साथ बल प्रयोग और हिंसा की गई, वह किसी लोकतांत्रिक व्यवस्था वाले देश के लिए निश्चित रूप से चिंता का विषय है।

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यह देश किसी एक राजनीतिक दल, किसी एक विचारधारा या किसी एक नेता की जागीर नहीं है। भारत की व्यवस्था संविधान, लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्ष सिद्धांतों पर आधारित है, जहाँ प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने और विरोध दर्ज कराने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी सरकार की वास्तविक जिम्मेदारी असहमति को बलपूर्वक दबाना नहीं, बल्कि उसका सामना संवैधानिक और लोकतांत्रिक तरीकों से करना है।
केंद्र और विभिन्न राज्यों की भाजपा सरकारों को चाहिए कि वे अपने पड़ोसी देशों—जैसे श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल—के राजनीतिक अनुभवों से सीख लें और भारत में किसी भी गंभीर जन-असंतोष के जन्म लेने से पहले अपनी संवैधानिक जिम्मेदारियों को समझते हुए जनता की मांगों पर गंभीरता से विचार करें।

यह नहीं भूलना चाहिए कि किसी भी देश का भविष्य उसके युवा तय करते हैं। यदि उनके अधिकारों और मांगों को ज़िद, अहंकार या शक्ति के बल पर दबाने की कोशिश की जाएगी तो उसके दूरगामी और हानिकारक परिणाम हो सकते हैं। सत्ता कभी स्थायी नहीं होती। आज कोई भी सरकार शक्ति के मद में स्वयं को अजेय मान सकती है, लेकिन सत्ता बदलते ही परिस्थितियाँ भी बदल जाती हैं। इसलिए प्रत्येक सरकार और प्रत्येक राजनीतिक नेतृत्व को यह विचार अवश्य करना चाहिए कि यदि कल सत्ता उनके हाथ से निकल जाए, तो क्या उनका अंत भी शेख हसीना से भिन्न होगा, जिन्हें व्यापक जनाक्रोश का सामना करना पड़ा?
लेखख शफ़ीक़ फैजी



