डॉक्टरों की सुरक्षा और सुप्रीम कोर्ट गाइडलाइन के पालन पर जोर
कानपुर: मोहम्मद उस्मान कुरैशी।
भारतीय बाल रोग अकादमी द्वारा मेडिको-लीगल विषयों पर एक महत्वपूर्ण प्रेस वार्ता का आयोजन हैलेट अस्पताल स्थित बाल रोग सभागार में किया गया। कार्यक्रम का संचालन डॉ. शैलेन्द्र गौतम और डॉ. ए. के. आर्य ने संयुक्त रूप से किया।
कार्यक्रम के मुख्य वक्ता और बाल रोग अकादमी के अध्यक्ष डॉ. जे. के. गुप्ता ने कहा कि चिकित्सा पेशे में कानूनी जटिलताएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। डॉक्टरों और अस्पतालों के खिलाफ मुकदमों की संख्या में वृद्धि हो रही है, और अब उपभोक्ता फोरम के साथ-साथ आपराधिक मामले भी दर्ज किए जा रहे हैं, जिससे चिकित्सक समुदाय चिंतित और आहत है।
उन्होंने बताया कि इलाज के दौरान मरीज की स्थिति बिगड़ने या मृत्यु होने पर डॉक्टरों पर सीधे आपराधिक मुकदमा दर्ज करने और गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण फैसलों, जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य, मार्टिन डिसूजा बनाम मो. अशफाक, ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा कुसुम शर्मा बनाम बत्रा हॉस्पिटल, में स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए हैं।
सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख गाइडलाइन
- केवल घोर चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में ही आपराधिक मुकदमा दर्ज हो।
- पुलिस प्रारंभिक जांच के बाद ही मामला दर्ज करे।
- सीएमओ द्वारा गठित बोर्ड की जांच अनिवार्य हो, और दोष सिद्ध होने पर ही आपराधिक कार्रवाई हो।
- डॉक्टरों की अनावश्यक गिरफ्तारी न की जाए।
- जांच अधिकारी विवेचना से पहले उसी क्षेत्र के विशेषज्ञ चिकित्सक की लिखित राय ले।
- इलाज के दौरान मृत्यु होने पर सीधे गैर-इरादतन हत्या की धारा लगाने के बजाय लापरवाही से मृत्यु की धारा लागू की जाए।
डॉ. गुप्ता ने बताया कि मार्टिन डिसूजा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टरों की अनावश्यक गिरफ्तारी करने पर पुलिस के खिलाफ कार्रवाई की चेतावनी भी दी है। उन्होंने कहा कि इन गाइडलाइन का पालन न होने के कारण कई दुखद घटनाएं सामने आई हैं। उदाहरण के तौर पर पिछले वर्ष राजस्थान की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अर्चना शर्मा ने गैर-इरादतन हत्या की धारा में मामला दर्ज होने के बाद आत्महत्या कर ली थी।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का पालन अनिवार्य
उन्होंने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 141 और 143 के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के फैसले सभी निचली अदालतों, सरकारी विभागों और पुलिस प्रशासन पर बाध्यकारी होते हैं। इनका पालन न करना अवमानना की श्रेणी में आता है। इसलिए पुलिस के उच्च अधिकारियों को समय-समय पर विभागीय सर्कुलर जारी कर इन निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।
मेडिकल नेगलिजेंस तय करने के सिद्धांत
कुसुम शर्मा बनाम बत्रा हॉस्पिटल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल नेगलिजेंस तय करने के लिए 11 सिद्धांत निर्धारित किए हैं। इनके अनुसार चिकित्सकीय राय में भिन्नता, मानक उपचार के बावजूद सुधार न होना, मृत्यु होना, निदान तक न पहुंच पाना या चिकित्सकीय दुर्घटना, ये सभी स्वतः लापरवाही की श्रेणी में नहीं आते। इसलिए अपेक्षित परिणाम न मिलने पर चिकित्सक को दोषी ठहराना उचित नहीं है।
डॉक्टरों की सुरक्षा पर चिंता
देश के अधिकांश राज्यों में मेडिकल प्रोटेक्शन एक्ट लागू है, जिसके तहत अस्पताल या क्लिनिक में हिंसा करने पर तीन वर्ष की सजा और 50 हजार रुपये जुर्माने का प्रावधान है। इसके बावजूद अस्पतालों में तोड़फोड़ और हिंसा के मामलों में अक्सर इस कानून के तहत कार्रवाई नहीं की जाती। केरल हाईकोर्ट ने डॉक्टरों और अस्पतालों पर हिंसा रोकने के लिए डीजीपी की जवाबदेही भी तय की थी। वक्ताओं ने सरकार और पुलिस प्रशासन से डॉक्टरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और दोषियों पर सख्त कार्रवाई की मांग की।
मीडिया से संतुलित भूमिका निभाने की अपील
अकादमी ने मीडिया से भी अपील की कि वह मरीजों और डॉक्टरों के बीच बढ़ते अविश्वास को कम करने में सकारात्मक भूमिका निभाए। एकतरफा खबरों से बचा जाए और झोलाछापों के कृत्यों को चिकित्सकों से न जोड़ा जाए। साथ ही डॉक्टरों द्वारा किए जा रहे बेहतर उपचार और सामाजिक कार्यों को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाए।
कार्यक्रम में डॉ. अमितेश यादव, डॉ. प्रतिभा सिंह सहित लगभग 50 रेजिडेंट छात्र उपस्थित रहे।



