जामिया अशरफुल मदारिस गद्दियाना में यौमे सिद्दीके अकबर का भव्य जलसा संपन्न
कानपुर, 13 दिसंबर। मोहम्मद उस्मान कुरैशी
मदरसा जामिया अशरफुल मदारिस गद्दियाना में ऑल इंडिया गरीब नवाज़ काउंसिल के तत्वावधान में जश्ने यौमे हज़रत सिद्दीके अकबर रज़ियल्लाहु अन्हु के मौके पर एक अज़ीमुश्शान जलसे का आयोजन किया गया। जलसे को संबोधित करते हुए काउंसिल के राष्ट्रीय अध्यक्ष व इमाम ईदगाह गद्दियाना मौलाना मोहम्मद हाशिम अशरफ़ी ने कहा कि नबियों के बाद उम्मत में सबसे बड़ा मरतबा हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ र.अ. का है और तमाम सहाबा-ए-किराम उनके फ़ज़ाइल को मानने वाले थे।
मौलाना अशरफ़ी ने कहा कि हज़रत मौला अली र.अ. का फ़रमान है कि पैग़म्बरे इस्लाम ﷺ के बाद इस उम्मत में सबसे अफ़ज़ल हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ र.अ. हैं। आप इस्लाम के पहले खलीफा हैं, सबसे पहले इस्लाम क़ुबूल करने वालों में हैं और आपकी चार नस्लें सहाबी-ए-रसूल होने का शरफ़ रखती हैं।
उन्होंने बताया कि “सिद्दीक़” हज़रत अबू बकर र.अ. का लक़ब है, जो इंसानों ने नहीं बल्कि अल्लाह तआला ने अता फ़रमाया। पैग़म्बरे इस्लाम ﷺ ने इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह और मुसलमान अबू बकर सिद्दीक़ से राज़ी हैं। वही लोगों को नमाज़ पढ़ाएंगे और मेरे बाद खिलाफ़त के लिए अबू बकर के अलावा किसी को क़ुबूल नहीं करेंगे।
मौलाना अशरफ़ी ने हज़रत अबू बकर र.अ. की ज़िंदगी के अहम पहलुओं पर रोशनी डालते हुए कहा कि आपकी पैदाइश वाक़या-ए-फ़ील के दो साल चार महीने बाद हुई। पैग़म्बरे इस्लाम ﷺ ने फ़रमाया कि “ऐ अबू बकर! तुम ग़ारे सौर में हमारे साथ रहे और हौज़े कौसर पर भी मेरे साथ रहोगे।” इस्लाम को किसी के माल से उतना फ़ायदा नहीं पहुंचा, जितना हज़रत अबू बकर र.अ. के माल से पहुंचा।
उन्होंने बताया कि हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ र.अ. का विसाल 22 जमादिउल आख़िर 13 हिजरी को हुआ और आपका मजार गुम्बदे ख़ज़रा के अंदर, पैग़म्बरे इस्लाम ﷺ के दाहिने पहलू पर है। क़यामत के दिन पैग़म्बरे इस्लाम ﷺ के बाद सबसे पहले हज़रत अबू बकर र.अ. अपनी क़ब्र से बाहर आएंगे। उन्होंने लोगों से सहाबा-ए-किराम से सच्ची मुहब्बत रखने की अपील की।
इससे पूर्व जलसे का आग़ाज़ क़ुरआन-ए-पाक की तिलावत से क़ारी मोहम्मद अहमद अशरफ़ी ने किया। जलसे का संचालन हाफ़िज़ मोहम्मद अरशद अशरफ़ी ने किया। मुश्ताक अहमद और हाफ़िज़ मुश्ताक अशरफ़ी ने नात व मनक़बत पेश कर समां बांध दिया। सलातो सलाम के बाद हिंदुस्तान समेत आलमे इस्लाम में अमन, अमान और खुशहाली के लिए दुआएं की गईं तथा तबर्रुक तकसीम किया गया।
जलसे में प्रमुख रूप से हाजी हैदर अली, नफीस अहमद, साबिर अली, जाबिर अली, शमशाद गाज़ी, मौलाना सुफियान मिस्बाही, मौलाना गुल मोहम्मद जामई, मौलाना मोअज्जम मिस्बाही, हाफ़िज़ मसूद रज़ा, हाफ़िज़ मुश्ताक अशरफ़ी, क़ारी सैयद क़ासिम बरकाती, मौलाना कलीम क़ादरी सहित बड़ी संख्या में अकीदतमंद मौजूद रहे।



