लखनऊ। मोहम्मद उस्मान कुरैशी
जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के महासचिव मौलाना अमीनुल हक़ अब्दुल्लाह क़ासमी ने वंदे मातरम् को लेकर प्रधानमंत्री के हालिया बयान पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि भारतीय मुसलमान इस देश, इसके संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच्चे वफ़ादार हैं। लेकिन ऐसे राजनीतिक बयान, जो मुसलमानों के धार्मिक विश्वासों के विपरीत हों, न केवल संविधान की भावना के खिलाफ़ हैं बल्कि सामाजिक सौहार्द को भी नुकसान पहुँचाते हैं।
मौलाना क़ासमी ने कहा कि वंदे मातरम् के कुछ हिस्सों में पूजा, पवित्रता और देवत्व का भाव निहित है, जो इस्लाम के मूल सिद्धांत ‘तौहीद’ के विरुद्ध जाता है। दारुल उलूम देवबंद के बड़े उलेमा हमेशा से यह स्पष्ट करते आए हैं कि देश से मोहब्बत एक प्राकृतिक भावना है, लेकिन इबादत सिर्फ़ अल्लाह का हक़ है।
उन्होंने एक ऐतिहासिक प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि जमीयत उलमा उत्तर प्रदेश के पूर्व अध्यक्ष और कानपुर के क़ाज़ी-ए-शहर, मौलाना मुहम्मद मतीनुल हक़ उसामा क़ासमी ने वर्षों पहले तत्कालीन केंद्रीय गृह राज्यमंत्री श्री प्रकाश जायसवाल से मुलाकात के दौरान बहुत हिकमत के साथ समझाया था कि इंसान अपनी माँ से सबसे ज़्यादा मोहब्बत करता है, लेकिन कोई मुसलमान अपनी माँ की भी इबादत नहीं कर सकता। इबादत सिर्फ़ खुदा की होती है। इसी तरह मुसलमानों को वंदे मातरम् कहने या गाने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। मोहब्बत और इबादत (उपासना) दो अलग-अलग दायरे हैं।
मौलाना क़ासमी ने ज़ोर देकर कहा कि यह देश सभी नागरिकों का है। किसी गीत या राष्ट्रगान के आधार पर नागरिकों की निष्ठा को मापना न तो संवैधानिक है और न ही नैतिक। उन्होंने जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना सैयद महमूद असअद मदनी के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि हम एक खुदा (ईश्वर) को मानने वाले लोग हैं और हमें अपनी धार्मिक पहचान के साथ जीने दिया जाना चाहिए। जो चाहे कोई गीत पढ़े, जिसे न पढ़ना हो उस पर कोई दबाव नहीं होना चाहिए।
उन्होंने आगे कहा कि मुसलमान हमेशा से राष्ट्रीय सम्मान, देश सेवा और संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन में आगे रहे हैं। वंदे मातरम् के वे हिस्से जो केवल देशभक्ति की भावना पर आधारित हैं, वे सम्मान के योग्य हैं, लेकिन जहाँ धरती को देवी या उपास्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है, वह इस्लामी आस्था के विरुद्ध है। देश के विविधतापूर्ण और बहुलतावादी चरित्र का तक़ाज़ा है कि इस सच्चाई को समझा जाए।
मौलाना क़ासमी ने सरकार से विनम्र अपील की कि वह देश के मुसलमानों की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करे और ऐसे बयानों व कदमों से बचे जो न्याय, समानता और संवैधानिक स्वतंत्रता के खिलाफ़ हों। उन्होंने कहा कि वतन की सेवा और निष्ठा के लिए इबादत की शर्त कभी नहीं रखी जानी चाहिए। हमारा संविधान धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है और हर नागरिक को अपने विश्वास और उपासना पद्धति पर पूरा अधिकार है।
अंत में उन्होंने मुस्लिम नौजवानों से अपील की कि वे अपनी पहचान पर गर्व करें, हीन भावना से बचें और इस्लाम की उज्ज्वल शिक्षाओं पर मज़बूती से क़ायम रहें। उन्होंने कहा, “वतन से मोहब्बत ईमान का हिस्सा है, लेकिन इबादत सिर्फ़ अल्लाह के लिए है। यही हमारे बुज़ुर्गों की तालीम है, यही जमीयत का स्टैंड है और यही हमारा संवैधानिक अधिकार भी है।



